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तप आराधक होता है मोक्ष का अधिकारी – गच्छाधिपति श्री

पिपलौदा / (प्रफुल जैन) – पावनिय चातुर्मास महोत्सव के दौरान श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ धाम पर गच्छाधिपति नित्यसेन सूरीश्वर जी म.सा.ने कहा कि मानव को यह नही समझना चाहिए कि वह भोगो का उपभोग कर रहा है क्योकि भोगो ने मानव का उपभोग किया है जिससे मानव तपस्या करने में पीछे हट जाता है ऐसी ही तप आराधना महोत्सव पंच मंगल महाश्रुत स्कन्ध (उपधान तप) में भाग ले रहे आराधको को तप, जप,आत्मिक साधना,संयम विनय,विवेक, स्वाध्याय, कायोत्सर्ग,इंद्रियों का दमन, कसायो का समन, अणुव्रतों की संपदा, ज्ञान,ध्यान, मुनि जीवन के साथ ही गुरु वाणी सुनकर प्रमाद से परिहार करना होता है उपधान तप को करने वाले भवि जीव श्रद्धावंत अनुक्रम से अजरामर स्थान मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकारी होता है ।

मुनिराज श्री सिद्धरत्न विजय जी म.सा.ने उत्तराध्यन सूत्र के बारे में बताते हुए कहा कि जैन शासन आदि अनादि काल से चला आ है मानव को तप त्याग यम नियम व्रत आराधना कर जीवन को सार्थक करना चाहिए व अहम का त्याग कर अर्हम की ओर अग्रसर होने हेतु प्रभु के बताए मार्ग का अनुशरण करना चाहिए आत्मा का ओषध पौषध है जो उपधान आराधक पोषध में रहकर साधु जीवन का पालन करेंगे।

मुनिराज श्री विद्वदरत्न विजय जी म.सा.ने कहा कि संसार असार है आज्ञा ही धर्म है बिना आज्ञा के कही प्रवेश करने पर मानव को कटु अनुभव होते है उसी प्रकार जिनशासन की आज्ञा में उपधान तप करना आवश्यक होता है साथ ही विक्रम चरित्र का उल्लेख करते हुए बताया कि मंत्री ने अवधूत ( विक्रम) को राजा मानकर स्वीकार कर लिया था व राज दरबार संभालने का निमंत्रण दिया अवधूत ने अग्नि बेताल की भूख शांत करने हेतु विभिन्न प्रकार की मिठाईया व सुगंधित द्रव्य अपने सयन कक्ष में रखने हेतु मंत्री को आदेशित किया जिससे अग्नि बेताल मानव व मिठाई की सुगंध मे उलझ जाता है ।
मुनिराज तारकरत्न विजय जी म.सा.द्वारा आत्म भावना प्राथर्ना करवाई गई ।
मुनिराज प्रशमसेन विजय जी म.सा.,मुनिराज श्री निर्भयरत्न विजय जी म.सा.उपस्थित थे।

ये रहे लाभार्थी – श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ धाम प्रचार सचिव प्रफुल जैन ने बताया कि दादा गुरुदेव व पूण्य सम्राट की आरती का लाभ शंकरलाल ताराचंद्र दंगवाड़ा परिवार बड़नगर , प्रभावना का लाभ सूर्य प्रकाश शाह चेन्नई,श्री संघ बड़नगर,श्री संघ इंदौर व थराद परिवार ने लिया सभी लाभार्थीयो का विजय कुमार चन्द्रगोता परिवार द्वारा बहुमान किया गया।

 

श्री संघो ने की क्षमायाचना – श्री संघ बड़नगर से कैलाश वोरा, शैलेश वोरा,श्री संघ इंदौर से महेंद्र जैन व थराद,मुम्बई,नीमच, जोबट,भीनमाल,अलीराजपुर, अहमदाबाद आदि श्री संघ ने गच्छाधिपति श्री व साधु साध्वी भगवंत का आशीर्वाद लेकर वार्षिक क्षमायाचना की नीमच की इसीका नलवाया ने उपधान तप पर सुंदर गीत की प्रस्तुति दी। साथ ही भांडवपुर महातीर्थ पर आयोजित सूर्य संयम सवर्ण पंचानहिका महोत्सव की अग्रिम मनुहार पत्रिका संगीतकार त्रिलोक मोदी ने गच्छाधिपति श्री व श्री संघ पिपलोदा को भेट कर आयोजन में पधारने का आग्रह किया संचालन चातुर्मास प्रभारी राकेश जैन ने किया।

क्या होता है उपधान – उपधान तप का तपोवन,उपासना का उपवन,चारित्र का चंपकवन व विरागता का वृंदावन होता है सम्पूर्ण उपधान में आरधको द्वारा पंद्रह सो नमुत्थुणं, आठ हजार लोगस्य,नो हजार खमासमण, एक हजार उनचालीस इरियावहिया व एक सो उन्नब्बे देववंदन की आराधना होती है व प्रतिदिन दो समय प्रतिक्रमण, पडीलेहणा,देवगुरु वंदन करना होता है व उपधानार्थी अपने पास कीमती सामान गहने व भौतिक साधन व बहने मंगल सूत्र व सौभाग्य चिन्ह के अलावा कुछ नही रख सकती व बोलते वक्त मुहपत्ति का उपयोग करना होता है चलते फिरते व खाते पीते जीव मात्र की दया की भाव से बात नही कर सकते व सभी जीवों के प्रति मैत्री,प्रमोद,करुणा एवम मध्यस्थ भाव रखना पड़ता है साथ ही आवश्यक क्रियाए हेतु जंगल मे जाना होता है ऐसी अनेक क्रियाए आराधकों को करना होती है।

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